Kalam Aaj Unki Jay bol Kavita ka bhavarth pikar jinki lal sikhaye

रामधारी सिंह दिनकर की कविता  'कलम उनकी जय बोल' को हम पूरा नहीं समझा सकते हैं। आपको पहले के दो भाग की व्याखा दे रहे हैं। इस आधार पर बाकी को आप स्वयं समझने का प्रयास करें।

१. जला अस्थियां बारी-बारी 

चिटकाई जिनमें चिंगारी, 

जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर 

लिए बिना गर्दन का मोल कलम, 

आज उनकी जय बोल 

प्रस्तुत काव्यांश में दिनकर जी ने अपने देश के वीरों के बलिदान को व्यक्त किया है। इन्होंने देश के लिए बिना किसी स्वार्थ के अपने प्राण भी न्योछावर कर दिए हैं। वह कहते हैं कि ये ऐसे बलिदानी है, जिन्होंने देश के लिए अपनी अस्थियों को भी जलाने से नहीं हिचकिचाए। अर्थात देश के लिए उन्होंने अंग्रेज़ों की मार  खाई। देश के गौरव और स्वतंत्रता के लिए उन्होंने  मृत्यु की पुण्यवेदी पर अपने प्राणों को न्योछावर कर दिया। इसके लिए उन्होंने देश से कोई आशा नहीं कि कोई मोल नहीं लिया। उनका उद्देश्य मात्र देश की स्वतंत्रता था और उन्होंने अपने स्वार्थों को किनारे रख देश का भाला किया। अतः वह सभी कवियो से अनुरोध करते हैं कि  तुम इन देशभक्तों की जय बोलो।  

२. जो अगणित लघु दीप हमारे 

तूफानों में एक किनारे, 

जल-जलाकर बुझ गए 

किसी दिन मांगा नहीं स्नेह मुंह खोल 

कलम, आज उनकी जय बोल 

प्रस्तुत काव्यांश में कवि ऐसे लोगों की जय बोलने के लिए कहते हैं, जोकि संघर्ष भरी जिंदगी से हार नहीं मानते और आखिरी समय तक संघर्ष करते रहते हैं। कवि कहते हैं कि देश की आज़ादी में  कितने ही लोगों ने प्रयास किया और संघर्ष भरी जिंदगी जीते रहे। अर्थात इन लोगों ने सरकार के आगे झुकना स्वीकार नहीं किया। अपने प्राणों से हाथ धोए परन्तु किसी से स्नेह और दया नहीं मांगी। डटकर संघर्ष भरे जीवन से लड़े अतः हे मेरे प्यारे साथियों तुम इनकी जल बोलो  और इन पर कविता लिखकर इनके बलिदान को श्रद्धांजलि दो।

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